हिमाचल प्रदेश चुनाव
ब्रांड मोदी रहा फीका
जहाँ आज देश में हर तरफ ब्रांड मोदी के चर्चे हैं वहीँ एक राज्य ऐसा भी रहा जहाँ मोदी के नाम का ख़ासा असर देखने को नहीं मिला। मैं बात कर रहा हूँ पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश की, जहाँ आज के दौर में जब हर तरफ भाजपा को सिर्फ नरेंद्र मोदी के नाम से ही जनता का भरपूर समर्थन मिल रहा है, आलम यह है की चाहे हरयाणा का विधानसभा चुनाव रहा हो या बिहार का चुनाव और फिर चाहे देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश का चुनाव ही क्यों न हो, कहीं पर भी भाजपा ने अपना सीएम कैंडिडेट घोषित किये बिना सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा और ज्यादातर जगहों पर सफलता हांसिल हुई। यहाँ तक की उनके अपने राज्य गुजरात में भी यह देखने को मिला की किस तरह चुनाव को पूरी तरह सफल बनाने में नरेंद्र मोदी की अहम भूमिका रही। एक तरह से अगर यह भी कहा जाए की वर्तमान समय में भाजपा के पास मोदी ही इकलौते ब्रांड नाम हैं और उनके पास सिवाय मोदी के कुछ भी ऐसा नहीं है जिसपर भाजपा जनता का समर्थन प्राप्त कर सके तो यह कहना भी गलत नहीं होगा। इसमें कोई शक नहीं की वर्तमान में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के आगे भाजपा या कांग्रेस ही नहीं बल्कि देश के हर नेता की लोकप्रियता फीकी है। लेकिन हिमाचल प्रदेश के चुनाव में इस बार कुछ अलग ही देखने को मिला, शुरुआती दौर में चर्चाएं ज़ोरों पर रहीं की हिमाचल में इस बार भाजपा कुछ नया करने का मन बना रही है। कभी पार्टी के अंदर से ही सुगबुगाहट सुनने को मिली की पार्टी इस बार हिमाचल चुनाव के जातिगत आंकड़ों को बदलते हुए सीएम कैंडिडेट पर एक नया बदलाव कर सकती है। लेकिन हिमाचल में नरेंद्र मोदी के नाम का खासा असर ना होता देख और का माहौल अपने पक्ष में जाता ना देख मजबूरी में भाजपा को पूर्व मुख्यमंत्री व् कद्दावर नेता प्रेम कुमार धूमल को सीएम उम्मीदवार के रूप में घोषित करना पड़ा।
दरअसल हिमाचल के जातिगत आंकड़ों पर नज़र डालें तो वहाँ के जातिगत समीकरण अन्य राज्यों से काफी अलग हैं, यहाँ सबसे ज़्यादा संख्या में क्षत्रिय (राजपूत/ठाकुर) वोटर हैं जिनकी संख्या 38 से 40 प्रतिशत के करीब है। क्षत्रिय के बाद दूसरा सबसे बड़ा संख्याबल यहाँ ब्राह्मण वोटर का है जिनकी संख्या करीब 18 से 20 प्रतिशत है। एक नज़र डालकर अगर देखा जाये तो 8 मार्च 1952 में हिमाचल के प्रथम मुख्यमंत्री बने यशवंत सिंह परमार से लेकर वर्तमान में सीएम वीरभद्र सिंह तक प्रदेश की राजनीती क्षत्रियों के इर्द गिर्द ही घूमती रही है, हिमाचल में महज़ एक ही मुख्यमंत्री गैर क्षत्रिय हुआ है। इस बार भी भाजपा को मजबूरन क्षत्रिय उम्मीदवार को साथ लेकर ही चुनाव में परचम लहराना पड़ा। लेकिन इन सब बातों से अलग हटकर प्रदेश में इस बार कुछ ऐसा हुआ जिसे देख कर पूरा देश अचंभित रह गया, जिस व्यक्ति के नाम पर भाजपा ने पूरे प्रदेश में समर्थन प्राप्त किया वो स्वयं अपनी ही सीट हार गया। मैं बात कर रहा हूँ हिमाचल के पूर्व सीएम व् भाजपा के सीएम कैंडिडेट प्रेम कुमार धूमल की जो स्वयं अपनी ही सीट से जीत हांसिल करने में सफल नहीं हुए। पहले पार्टी द्वारा उनको उनकी परंपरागत सीट रही हमीरपुर विधानसभा से न लड़ने का फैंसला लिया गया। उनको दूसरी विधानसभा से चुनाव लड़ाया गया और उनको हार का सामना करना पड़ा। यह हार उनके समर्थकों के साथ साथ उनके विरोधियों और प्रदेशवासियों भी नहीं पची। चारो तरफ बस इसी बात के चर्चे हैं की जिस व्यक्ति के नाम पर प्रदेश में भाजपा को जीत मिली वो स्वयं होनी ही सीट कैसे हार गया। और अगर ऐसा हुआ है तो ऐसे में कई सवाल खड़े होते हैं। क्या इस बात का अंदाज़ा पार्टी को पहले से नहीं था ? ऐसा क्या हुआ जो पार्टी ने उन्हें हमीरपुर विधानसभा से लड़ने की मंज़ूरी नहीं दी ? जिस व्यक्ति के नाम पर प्रदेश में वोट मिले उसी व्यक्ति के स्वयं हार जाने का कारण कहीं पार्टी का भीतरघात तो नहीं ? भाजपा की लेहर में धूमल के साथ साथ उनके सारे सगे सम्बन्धियों का हारना क्या ये महज़ एक इत्तेफाक ही है ? हिमाचल प्रदेश के साथ साथ सम्पूर्ण देश में भाजपा की जीत से ज्यादा धूमल की हार के चर्चे हैं। लोगों में यह कयास लगाए जा रहे हैं की धूमल की हार की साज़िश भाजपा नेताओं द्वारा ही रची गयी है। धूमल की लोकप्रियता को देखते हुए उनके राजनितिक वर्चस्व को ख़त्म करने का उनके विरोधियोँ के पास यह सबसे अच्छा मौका है। अब अंदर ही अंदर चर्चाएं हैं की पार्टी द्वारा जयराम ठाकुर के नाम पर मुहर लगाई जा सकती है। पार्टी नेताओं द्वारा कहा जा रहा है की चुने हुए विधायकों में से ही मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। इसका मतलब साफ़ है की भाजपा नेतृत्व अपने ही आदमी को सत्ता पर काबिज़ करने पर तुला हुआ है। इससे पहले भी भाजपा में कई ऐसे नेता हुए हैं जो चुनाव हरने के बाद भी मंत्री बनाए गए हैं , बस फर्क इतना था की वे लोग भाजपा के राष्ट्रिय अध्यक्ष व प्रधानमंत्री के चहीते थे। इससे पहले भी 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा लहर के चलते भी अरुण जेटली गुरुदासपुर और स्मृति ईरानी अमेठी से चुनाव हार चुकीं हैं। इसके पश्चात भी अरुण जेटली और स्मृति ईरानी वर्तमान सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। तो धूमल को भी इसी तर्ज पर मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया जा सकता जबकि उनके समर्थन में कई विधायक अपनी सीट छोड़ने तक का ऐलान कर चुके हैं।क्या भाजपा का शीर्ष नेतृत्व हर जगह अपनी कठपुतली बैठना चाहता है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन दूर नहीं होगा की भाजपा सिर्फ चंद लोगों की पार्टी रह जाएगी और आंतरिक लोकतंत्र नाम की कोई चीज़ नहीं रह जाएगी।
ब्रांड मोदी रहा फीका
जहाँ आज देश में हर तरफ ब्रांड मोदी के चर्चे हैं वहीँ एक राज्य ऐसा भी रहा जहाँ मोदी के नाम का ख़ासा असर देखने को नहीं मिला। मैं बात कर रहा हूँ पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश की, जहाँ आज के दौर में जब हर तरफ भाजपा को सिर्फ नरेंद्र मोदी के नाम से ही जनता का भरपूर समर्थन मिल रहा है, आलम यह है की चाहे हरयाणा का विधानसभा चुनाव रहा हो या बिहार का चुनाव और फिर चाहे देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश का चुनाव ही क्यों न हो, कहीं पर भी भाजपा ने अपना सीएम कैंडिडेट घोषित किये बिना सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा और ज्यादातर जगहों पर सफलता हांसिल हुई। यहाँ तक की उनके अपने राज्य गुजरात में भी यह देखने को मिला की किस तरह चुनाव को पूरी तरह सफल बनाने में नरेंद्र मोदी की अहम भूमिका रही। एक तरह से अगर यह भी कहा जाए की वर्तमान समय में भाजपा के पास मोदी ही इकलौते ब्रांड नाम हैं और उनके पास सिवाय मोदी के कुछ भी ऐसा नहीं है जिसपर भाजपा जनता का समर्थन प्राप्त कर सके तो यह कहना भी गलत नहीं होगा। इसमें कोई शक नहीं की वर्तमान में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के आगे भाजपा या कांग्रेस ही नहीं बल्कि देश के हर नेता की लोकप्रियता फीकी है। लेकिन हिमाचल प्रदेश के चुनाव में इस बार कुछ अलग ही देखने को मिला, शुरुआती दौर में चर्चाएं ज़ोरों पर रहीं की हिमाचल में इस बार भाजपा कुछ नया करने का मन बना रही है। कभी पार्टी के अंदर से ही सुगबुगाहट सुनने को मिली की पार्टी इस बार हिमाचल चुनाव के जातिगत आंकड़ों को बदलते हुए सीएम कैंडिडेट पर एक नया बदलाव कर सकती है। लेकिन हिमाचल में नरेंद्र मोदी के नाम का खासा असर ना होता देख और का माहौल अपने पक्ष में जाता ना देख मजबूरी में भाजपा को पूर्व मुख्यमंत्री व् कद्दावर नेता प्रेम कुमार धूमल को सीएम उम्मीदवार के रूप में घोषित करना पड़ा।
दरअसल हिमाचल के जातिगत आंकड़ों पर नज़र डालें तो वहाँ के जातिगत समीकरण अन्य राज्यों से काफी अलग हैं, यहाँ सबसे ज़्यादा संख्या में क्षत्रिय (राजपूत/ठाकुर) वोटर हैं जिनकी संख्या 38 से 40 प्रतिशत के करीब है। क्षत्रिय के बाद दूसरा सबसे बड़ा संख्याबल यहाँ ब्राह्मण वोटर का है जिनकी संख्या करीब 18 से 20 प्रतिशत है। एक नज़र डालकर अगर देखा जाये तो 8 मार्च 1952 में हिमाचल के प्रथम मुख्यमंत्री बने यशवंत सिंह परमार से लेकर वर्तमान में सीएम वीरभद्र सिंह तक प्रदेश की राजनीती क्षत्रियों के इर्द गिर्द ही घूमती रही है, हिमाचल में महज़ एक ही मुख्यमंत्री गैर क्षत्रिय हुआ है। इस बार भी भाजपा को मजबूरन क्षत्रिय उम्मीदवार को साथ लेकर ही चुनाव में परचम लहराना पड़ा। लेकिन इन सब बातों से अलग हटकर प्रदेश में इस बार कुछ ऐसा हुआ जिसे देख कर पूरा देश अचंभित रह गया, जिस व्यक्ति के नाम पर भाजपा ने पूरे प्रदेश में समर्थन प्राप्त किया वो स्वयं अपनी ही सीट हार गया। मैं बात कर रहा हूँ हिमाचल के पूर्व सीएम व् भाजपा के सीएम कैंडिडेट प्रेम कुमार धूमल की जो स्वयं अपनी ही सीट से जीत हांसिल करने में सफल नहीं हुए। पहले पार्टी द्वारा उनको उनकी परंपरागत सीट रही हमीरपुर विधानसभा से न लड़ने का फैंसला लिया गया। उनको दूसरी विधानसभा से चुनाव लड़ाया गया और उनको हार का सामना करना पड़ा। यह हार उनके समर्थकों के साथ साथ उनके विरोधियों और प्रदेशवासियों भी नहीं पची। चारो तरफ बस इसी बात के चर्चे हैं की जिस व्यक्ति के नाम पर प्रदेश में भाजपा को जीत मिली वो स्वयं होनी ही सीट कैसे हार गया। और अगर ऐसा हुआ है तो ऐसे में कई सवाल खड़े होते हैं। क्या इस बात का अंदाज़ा पार्टी को पहले से नहीं था ? ऐसा क्या हुआ जो पार्टी ने उन्हें हमीरपुर विधानसभा से लड़ने की मंज़ूरी नहीं दी ? जिस व्यक्ति के नाम पर प्रदेश में वोट मिले उसी व्यक्ति के स्वयं हार जाने का कारण कहीं पार्टी का भीतरघात तो नहीं ? भाजपा की लेहर में धूमल के साथ साथ उनके सारे सगे सम्बन्धियों का हारना क्या ये महज़ एक इत्तेफाक ही है ? हिमाचल प्रदेश के साथ साथ सम्पूर्ण देश में भाजपा की जीत से ज्यादा धूमल की हार के चर्चे हैं। लोगों में यह कयास लगाए जा रहे हैं की धूमल की हार की साज़िश भाजपा नेताओं द्वारा ही रची गयी है। धूमल की लोकप्रियता को देखते हुए उनके राजनितिक वर्चस्व को ख़त्म करने का उनके विरोधियोँ के पास यह सबसे अच्छा मौका है। अब अंदर ही अंदर चर्चाएं हैं की पार्टी द्वारा जयराम ठाकुर के नाम पर मुहर लगाई जा सकती है। पार्टी नेताओं द्वारा कहा जा रहा है की चुने हुए विधायकों में से ही मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। इसका मतलब साफ़ है की भाजपा नेतृत्व अपने ही आदमी को सत्ता पर काबिज़ करने पर तुला हुआ है। इससे पहले भी भाजपा में कई ऐसे नेता हुए हैं जो चुनाव हरने के बाद भी मंत्री बनाए गए हैं , बस फर्क इतना था की वे लोग भाजपा के राष्ट्रिय अध्यक्ष व प्रधानमंत्री के चहीते थे। इससे पहले भी 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा लहर के चलते भी अरुण जेटली गुरुदासपुर और स्मृति ईरानी अमेठी से चुनाव हार चुकीं हैं। इसके पश्चात भी अरुण जेटली और स्मृति ईरानी वर्तमान सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। तो धूमल को भी इसी तर्ज पर मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया जा सकता जबकि उनके समर्थन में कई विधायक अपनी सीट छोड़ने तक का ऐलान कर चुके हैं।क्या भाजपा का शीर्ष नेतृत्व हर जगह अपनी कठपुतली बैठना चाहता है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन दूर नहीं होगा की भाजपा सिर्फ चंद लोगों की पार्टी रह जाएगी और आंतरिक लोकतंत्र नाम की कोई चीज़ नहीं रह जाएगी।
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